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क्या सुस्पष्ट सपने सचमुच होते हैं? विज्ञान ने इन्हें कैसे साबित किया

सुस्पष्ट सपने (लूसिड ड्रीमिंग) पहली नज़र में ऐसी परिघटना लगते हैं जिसे कभी जाँचा ही नहीं जा सकता। फिर भी 1980 के दशक से नींद की प्रयोगशालाएँ इन्हें ठोस ढंग से साबित करती आ रही हैं — यहाँ तक कि सपने देख रहे लोगों से सीधे, उसी पल बातचीत भी कर चुकी हैं। पढ़िए, यह सब किस तरह संभव हुआ, इससे क्या सिद्ध होता है और क्या नहीं।

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सुस्पष्ट सपना (लूसिड ड्रीम) वह सपना होता है जिसमें सपना देखते-देखते ही आपको यह एहसास रहता है कि आप सपना देख रहे हैं। बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक यह बात अजीब-सी उलझन में फँसी रही: करोड़ों लोग ऐसा अनुभव बताते थे, मगर इसे जाँचने का कोई ज़रिया नज़र नहीं आता था। सपना ठहरा एकदम निजी चीज़। आप जब तक जागकर उसे बयान करते हैं, तब तक वह अनुभव महज़ एक याद बन चुका होता है — ऐसी याद जिसे मन ने दोबारा गढ़ा हो और शायद थोड़ा सजा-सँवार भी दिया हो। तो आख़िर कोई यह कैसे साबित करे कि सोया हुआ इंसान ठीक उसी क्षण, सपने के भीतर, सचमुच होश में था? इसका जवाब हैरान कर देने वाली सादगी से सूझा, और इसी ने सुस्पष्ट सपनों को एक अजूबे से निकालकर मापी जा सकने वाली वैज्ञानिक परिघटना बना दिया।

असली अड़चन: सोते हुए इंसान से सवाल-जवाब नहीं किए जा सकते

नींद के दौरान शरीर में क्या-क्या चल रहा है, इसे वैज्ञानिक बेहद बारीकी से दर्ज कर सकते हैं। पॉलीसोम्नोग्राफी — यानी प्रयोगशाला की मानक जाँच-व्यवस्था — EEG से दिमाग़ की तरंगें, इलेक्ट्रोऑक्युलोग्राफी से आँखों की हरकत, इलेक्ट्रोमायोग्राफी से मांसपेशियों की टोन, और साथ ही धड़कन तथा साँस को नापती है। इन्हीं संकेतों के आधार पर कोई शोधकर्ता पूरे भरोसे से बता सकता है कि व्यक्ति नींद की किस अवस्था में है — इसमें तीव्र-नेत्र-गति (REM) नींद भी शामिल है, यानी वह अवस्था जिससे सबसे जीवंत सपनों की रिपोर्ट मिलती है। लेकिन इनमें से एक भी उपकरण यह नहीं पढ़ सकता कि सपने में चल क्या रहा है। ये बस इतना बताते हैं कि कोई सपना देख रहा है; पर यह नहीं कि वह देख क्या रहा है, और न ही यह कि सपने देखने वाले को इसका होश है या नहीं। सुस्पष्टता को साबित करने के लिए शोधकर्ताओं को ऐसा तरीका चाहिए था जिससे सपना देखने वाला, सपने के चलते-चलते ही, सोच-समझकर कोई संदेश बाहर भेज सके।

हम क्या जानते हैं

  • सुस्पष्ट सपनों की पुष्टि ठोस आँकड़ों से हो चुकी है: प्रशिक्षित लोगों ने पुष्ट REM नींद के भीतर से ही संकेत देकर जता दिया कि उन्हें मालूम है, वे सपना देख रहे हैं।
  • यह संकेत इसलिए काम करता है क्योंकि आँखें घुमाने वाली मांसपेशियाँ उस लकवे की चपेट में प्रायः नहीं आतीं, जो REM नींद के दौरान बाक़ी पूरे शरीर को जकड़ लेता है।
  • आँखों के इशारे वाला यही तरीका दशकों तक, कई प्रयोगशालाओं में बार-बार आज़माया गया है, इसीलिए इस बुनियादी नतीजे को पूरी तरह स्थापित माना जाता है।

वह निर्णायक खोज: आँखों से भेजा गया इशारा

असली सूझ यह थी: REM नींद लगभग पूरे शरीर को लकवे जैसी हालत में डाल देती है — यह एक तरह का सुरक्षा-इंतज़ाम है, जो हमें अपने सपनों को हाथ-पाँव चलाकर सचमुच जीने से रोकता है — मगर आँखों को यह लकवा नहीं छूता। REM के दौरान आँखें बेरोक-टोक घूमती रहती हैं; नाम में जो 'तीव्र नेत्र गति' है, इशारा उसी ओर है। अब अगर सपना देखने वाला सोने से पहले ही तय कर ले कि सुस्पष्ट होते ही वह आँखों से कोई ख़ास, अनोखी हरकत करेगा, तो वह हरकत इलेक्ट्रोऑक्युलोग्राम पर साफ़ उभर आएगी — और तब भी शारीरिक संकेत यही पुष्टि करते रहेंगे कि वह व्यक्ति अब भी सो ही रहा है। यह दरअसल सपने के भीतर से भेजा गया एक संदेश होगा।

और हुआ भी ठीक ऐसा ही। 1975 में ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक कीथ हर्न ने एलन वर्स्ली नाम के एक सुस्पष्ट सपने देखने वाले से पहले से तय आँखों के इशारे दर्ज किए। कुछ ही साल बाद, अमेरिका में अलग से काम कर रहे स्टीफन लाबर्ज और उनके साथियों ने सुनियंत्रित अध्ययन किए और 1981 में नतीजे एक सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका में छापे। उनके प्रशिक्षित प्रतिभागियों ने ठीक उसी पल जान-बूझकर बाएँ-दाएँ-बाएँ-दाएँ आँखें घुमाईं, जिस पल उन्होंने पहचाना कि वे सपना देख रहे हैं, और ये इशारे शारीरिक संकेतों से पुष्ट REM नींद के दौरान दर्ज हुए। पहली बार ऐसा हुआ कि सपने के अंदरूनी अनुभव के बारे में किया गया कोई व्यक्तिगत दावा, एक ठोस और समय-अंकित रिकॉर्ड से जा मिला। अब सुस्पष्ट सपना महज़ कोई किस्सा नहीं रह गया था; वह नाप-तौल के दायरे वाला वैज्ञानिक प्रमाण बन चुका था।

REM एटोनिया
REM नींद के दौरान कंकाल-पेशियों की टोन लगभग पूरी तरह ख़त्म हो जाना, जिसकी वजह से शरीर सपनों को हाथ-पाँव चलाकर नहीं जी पाता। ख़ास बात यह है कि यह आँखों की मांसपेशियों को बख़्श देता है — और यही वह छूट है जो सपने के भीतर से सोच-समझकर आँखों की हरकत वाले इशारे भेजना मुमकिन बनाती है।

सुस्पष्टता के पल दिमाग़ कैसा बरताव करता है

एक बार जब सुस्पष्टता का वह क्षण भरोसेमंद ढंग से दर्ज होने लगा, तो शोधकर्ता एक कहीं ज़्यादा मुश्किल सवाल पूछ सके: ठीक उस पल दिमाग़ में अलग क्या घटता है? EEG की मदद से उर्सुला वॉस और उनके साथियों ने 2009 में बताया कि सुस्पष्ट REM नींद किसी मिली-जुली अवस्था जैसी दिखती है — न तो पूरी तरह जागृत अवस्था जैसी और न ही आम REM जैसी — जिसमें दिमाग़ के अगले हिस्सों पर गामा बैंड (क़रीब 40 हर्ट्ज़) की तेज़-आवृत्ति वाली हलचल बढ़ी हुई मिलती है। आगे चलकर EEG और fMRI को साथ इस्तेमाल करने वाले काम ने दिमाग़ के उन अगले (फ्रंटल) और पार्श्व (पैराइटल) इलाक़ों में बढ़ी हुई सक्रियता की ओर इशारा किया, जिनका नाता आत्म-जागरूकता और सोच-विचार से है — वही इलाक़े, जो आम तौर पर गैर-सुस्पष्ट यानी सामान्य सपनों में शांत पड़े रहते हैं।

दिमाग़ से जुड़े ये नतीजे सचमुच दिलचस्प हैं, मगर बुनियादी पुष्टि के मुक़ाबले इन्हें कहीं ज़्यादा एहतियात से लेना चाहिए। ख़ासकर न्यूरोइमेजिंग वाले अध्ययन तो बहुत छोटे-छोटे नमूनों के सहारे टिके हैं — कई बार तो एक ही व्यक्ति के गिने-चुने सुस्पष्ट प्रसंग — क्योंकि स्कैनर के भीतर किसी सत्यापित सुस्पष्ट सपने को पकड़ पाना बिरला और टेढ़ा काम है। यह पैटर्न उस उम्मीद से मेल खाता है कि सुस्पष्टता के पल आत्म-जागरूकता मानो दोबारा 'चालू' हो जाती है, पर ठीक-ठीक कौन-से इलाक़े, असर कितना बड़ा, और यह एक इंसान से दूसरे में कैसे बदलता है — इन सबको पुख़्ता करने के लिए अब भी बड़े पैमाने के अध्ययन चाहिए।

सपना देख रहे किसी इंसान से बातचीत करना

अगर सपना देखने वाला एक इशारा बाहर भेज सकता है, तो क्या वह बाहर से आया कोई संदेश भी भाँप सकता है और उसका जवाब दे सकता है? 2021 में कैरेन कोंकोली की अगुवाई वाली एक टीम ने अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड की चार अलग-अलग प्रयोगशालाओं के नतीजे छापे। शोधकर्ताओं ने सोते हुए, सुस्पष्ट प्रतिभागियों से आवाज़, रोशनी या छुअन के ज़रिए सीधे-सादे सवाल पूछे — इनमें 'आठ में से छह घटाएँ तो कितने बचे?' जैसा मामूली जोड़-घटाव भी था। सपना देखने वालों ने इन सवालों को अपने सपने के भीतर ही समझा और उसी पल, गिनी हुई आँख-हरकतों या चेहरे की मांसपेशियों की हल्की फड़कन से इशारा देकर सही जवाब दिए। बात यहीं भरोसेमंद बन जाती है कि चार प्रयोगशालाओं ने अलग-अलग तरीक़ों से, एक-दूसरे से बेख़बर रहते हुए यही कर दिखाया — तभी यह महज़ किस्सा नहीं रह जाता।

सपने के दौरान यह दोतरफ़ा संवाद — जिसे 'इंटरैक्टिव ड्रीमिंग' कहा गया — सचमुच चौंका देने वाला प्रदर्शन है। पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि शोधकर्ता आपके सपने पढ़ लेंगे या उनमें कुछ डाल देंगे; इसमें सूचना के आने-जाने की गुंजाइश बेहद कम है, कामयाबी का अनुपात भी मामूली है, और यह सिर्फ़ उन्हीं प्रशिक्षित लोगों के साथ चलता है जो पहले से सुस्पष्ट सपने देख रहे हों। फिर भी यह दिखा देता है कि सपने में डूबा दिमाग़, सही हालात मिलें तो, बिना जागे ही बाहरी दुनिया को भाँप सकता है, उस पर सोच सकता है, और जवाब भी दे सकता है।

विवादों वाला अगला पड़ाव: क्या सुस्पष्टता बाहर से जगाई जा सकती है?

इसके बाद अपने-आप अगला सवाल यह उठता है कि क्या सुस्पष्टता को बाहर से, जान-बूझकर उभारा जा सकता है। 2014 में एक अध्ययन ने बताया कि REM नींद के दौरान सिर के अगले हिस्से पर गामा आवृत्तियों की हल्की प्रत्यावर्ती बिजली की धारा दौड़ाने से सपनों में आत्म-जागरूकता बढ़ी। इस नतीजे ने ख़ूब सुर्ख़ियाँ बटोरीं — और उतना ही शक भी। स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा इसकी पुष्टि अब तक सीमित ही रही है और इसका मतलब भी विवाद में है, इसलिए इसे कोई जमा-जमाया तथ्य नहीं, बल्कि एक दिलचस्प प्रयोगात्मक सुराग़ मानकर पढ़ना चाहिए।

हम क्या नहीं जानते

  • दिमाग़ी हलचल के स्तर पर किसी REM प्रसंग के भीतर सुस्पष्टता आख़िर किस वजह से शुरू होती है, यह अब भी राज़ बना हुआ है।
  • न्यूरोइमेजिंग वाली तस्वीर बहुत छोटे नमूनों पर टिकी है, और इसकी पुष्टि के लिए पर्याप्त प्रतिभागियों वाले बड़े दोहराव-अध्ययन ज़रूरी हैं।
  • प्रयोगशाला के सुनियंत्रित नतीजे घर पर अपने-आप आने वाले सुस्पष्ट सपनों पर कितने लागू होते हैं, इस पर अभी छानबीन जारी है।
  • क्या बाहर से दिया गया उद्दीपन भरोसेमंद और सुरक्षित ढंग से सुस्पष्टता ला सकता है, इसका जवाब अभी अधूरा है।

तो आख़िर — क्या सुस्पष्ट सपने सच हैं?

हाँ। चेतना की जितनी भी असाधारण अवस्थाएँ हैं, उनमें सुस्पष्ट सपना सबसे अच्छी तरह सत्यापित अवस्थाओं में गिना जाता है। इसका वजूद किसी आस्था या गवाही भर के सहारे नहीं, बल्कि चालीस साल से ज़्यादा अरसे में जुटाए गए ठोस और बार-बार दोहराए जा सकने वाले प्रयोगशाला प्रमाण पर खड़ा है। जो बात अब भी साफ़ नहीं है, वह यह नहीं कि सुस्पष्ट सपने होते हैं या नहीं — वे होते हैं — बल्कि यह कि दिमाग़ इन्हें ठीक-ठीक किस तरह जन्म देता है, इन्हें कितने भरोसे से सिखाया या जगाया जा सकता है, और प्रयोगशाला में बनी यह समझ रोज़मर्रा की नींद तक कितनी पहुँचती है। यही वे खुले मोर्चे हैं — और ठीक यही सवाल हैं जिन पर आज के स्वप्न वैज्ञानिक जुटे हुए हैं।

क्या सुस्पष्ट सपने वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुके हैं?

हाँ। 1981 से अब तक के सुनियंत्रित प्रयोगशाला अध्ययनों ने सुस्पष्ट सपनों को साबित किया है — इसके लिए उन्होंने प्रशिक्षित लोगों से, शारीरिक संकेतों से पुष्ट REM नींद के दौरान, पहले से तय आँखों की हरकतों के ज़रिए अपनी जागरूकता का इशारा करवाया। यह तरीका कई प्रयोगशालाओं में दोहराया जा चुका है।

वैज्ञानिकों ने यह कैसे साबित किया कि सुस्पष्ट सपने सच हैं?

उन्होंने इस बात का फ़ायदा उठाया कि शरीर के लकवाग्रस्त होने के बावजूद REM नींद में आँखें फिर भी घूमती रहती हैं। सपना देखने वालों ने पहले से तय कर लिया कि सुस्पष्ट होते ही वे आँखों से एक ख़ास हरकत करेंगे; वह इशारा आँख-गति के रिकॉर्ड पर तब उभरा जब शारीरिक संकेत पुष्टि कर रहे थे कि व्यक्ति सो रहा है — इस तरह उसका निजी बयान ठोस आँकड़ों से जा मिला।

क्या शोधकर्ता आपके सपना देखते वक़्त आपसे बात कर सकते हैं?

एक हद तक, हाँ। 2021 में चार अलग-अलग प्रयोगशालाओं ने सुस्पष्ट सपने देख रहे सोते हुए लोगों से सीधे-सादे सवाल पूछे, जिन्हें उन्होंने समझा और उसी पल आँखों की हरकत तथा चेहरे की मांसपेशियों के इशारों से सही जवाब दिए। यह बातचीत धीमी रहती है और सिर्फ़ उन्हीं प्रशिक्षित लोगों के साथ चलती है जो पहले से सुस्पष्ट सपने देख रहे हों।

क्या दिमाग़ी उद्दीपन सचमुच सुस्पष्ट सपने पैदा करता है?

इसका जवाब अभी अधूरा है। 2014 के एक अध्ययन ने बताया कि मस्तिष्क के अग्र भाग पर गामा-आवृत्ति वाली विद्युत उत्तेजना से सपनों में आत्म-जागरूकता बढ़ी, पर यह नतीजा पुख़्ता तौर पर दोहराया नहीं जा सका है और अब भी विवाद में है। यह कोई प्रमाणित तरीक़ा नहीं है, और न ही इसे घर पर आज़माने की कोई विधि माना जाना चाहिए।